Ganpati Atharvashirsha with meaning

Ganpati Atharvashirsha with hindi meaning

Pravas Sukhacha

5/8/20261 min read

१-गणपत्यथर्वशीर्षम्

[अथर्वशीर्षकी परम्परामें 'गणपत्यथर्वशीर्ष' का विशेष महत्त्व है। प्रायः प्रत्येक मांगलिक कार्यमें गणपति-पूजनके अनन्तर प्रार्थनारूपमें इसके पाठकी परम्परा है। यह भगवान् गणपतिका वैदिक स्तवन है। गणपति महामन्त्र 'ॐ गं गणपतये नमः' एवं गणेश गायत्री मन्त्रका भी इसके अन्तर्गत माहात्म्यसहित समावेश है। इसका पाठ करनेवाला किसी भी प्रकारके विघ्नसे बाधित न होता हुआ महापातकोंसे मुक्त हो जाता है तथा धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष- इन चारों पुरुषार्थीको प्राप्त करता है। इस गणपत्यथर्वशीर्षको यहाँ सूक्तरूपमें सानुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है-]

ॐ भद्रं कर्णेभिरिति शान्तिः ॥*

ॐ नमस्ते गणपतये । त्वमेव प्रत्यक्षं तत्त्वमसि । त्वमेव केवलं कर्तासि। त्वमेव केवलं धर्तासि । त्वमेव केवलं हर्तासि। त्वमेव सर्वं खल्विदं ब्रह्मासि । त्वं साक्षादात्मासि नित्यम् ॥ १॥

ऋतं वच्मि । सत्यं वच्मि ॥ २॥

अव त्वं माम्। अव वक्तारम्। अव श्रोतारम्। अव दातारम्। अव धातारम्। अव अनूचानम्। अव शिष्यम् ।

गणपतिको नमस्कार है, तुम्हीं प्रत्यक्ष तत्त्व हो, तुम्हीं केवल कर्ता, तुम्हीं केवल धारणकर्ता और तुम्हीं केवल संहारकर्ता हो, तुम्हीं केवल समस्त विश्वरूप ब्रह्म हो और तुम्हीं साक्षात् नित्य आत्मा हो ॥ १ ॥

यथार्थ कहता हूँ। सत्य कहता हूँ ॥ २॥

तुम मेरी रक्षा करो। वक्ताकी रक्षा करो। श्रोताकी रक्षा करो। दाताकी रक्षा करो। धाताकी रक्षा करो। षडंग वेदविद् आचार्यकी रक्षा करो। शिष्यकी

अव पश्चात्तात्। अव पुरस्तात् । अवोत्तरात्तात् । अव दक्षिणात्तात् । अव चोर्ध्वात्तात् । अवाधस्तात् । सर्वतो मां पाहि पाहि समन्तात् ॥ ३ ॥

त्वं वाङ्मयस्त्वं चिन्मयः । त्वमानन्दमयस्त्वं ब्रह्ममयः । त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोऽसि । त्वं प्रत्यक्षं ब्रह्मासि । त्वं ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ॥ ४ ॥

सर्वं जगदिदं त्वत्तो जायते। सर्वं जगदिदं त्वत्तस्तिष्ठति । सर्वं जगदिदं त्वयि लयमेष्यति। सर्वं जगदिदं त्वयि प्रत्येति। त्वं भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः । त्वं चत्वारि वाक्पदानि ॥ ५ ॥

त्वं गुणत्रयातीतः । त्वं कालत्रयातीतः । त्वं देहत्रयातीतः । त्वं मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम्। त्वं

रक्षा करो। पीछेसे रक्षा करो। आगेसे रक्षा करो। उत्तर (वाम) भागकी रक्षा करो। दक्षिण भागकी रक्षा करो। ऊपरसे रक्षा करो। नीचेकी ओरसे रक्षा करो। सर्वतोभावसे मेरी रक्षा करो, सब दिशाओंसे मेरी रक्षा करो ॥ ३ ॥

तुम वाड्मय हो, तुम चिन्मय हो। तुम आनन्दमय हो, तुम ब्रह्ममय हो। तुम सच्चिदानन्द अद्वितीय परमात्मा हो। तुम प्रत्यक्ष ब्रह्म हो। तुम ज्ञानमय हो, विज्ञानमय हो ॥ ४ ॥

यह सारा जगत् तुमसे उत्पन्न होता है। यह सारा जगत् तुमसे सुरक्षित रहता है। यह सारा जगत् तुममें लीन होता है। यह अखिल विश्व तुममें ही प्रतीत होता है। तुम्हीं भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश हो। तुम्हीं परा, पश्यन्ती, मध्यमा और वैखरी चतुर्विध वाक् हो ॥५॥

तुम सत्त्व-रज-तम-इन तीनों गुणोंसे परे हो। तुम भूत-भविष्यत्-वर्तमान- इन तीनों कालोंसे परे हो। तुम स्थूल, सूक्ष्म और कारण-इन

शक्तित्रयात्मकः । त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम्। त्वं ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वं रुद्रस्त्वमिन्द्रस्त्वमग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वं चन्द्रमास्त्वं ब्रह्म भूर्भुवः स्वरोम् ॥ ६ ॥

गणादिं पूर्वमुच्चार्य वर्णादिं तदनन्तरम् । अनुस्वारः परतरः । अर्धेन्दुलसितम् । तारेण रुद्धम् । एतत्तव मनुस्वरूपम्। गकारः पूर्वरूपम् । अकारो मध्यमरूपम् । अनुस्वारश्चान्त्यरूपम् । बिन्दुरुत्तररूपम्। नादः सन्धानम् । संहिता सन्धिः । सैषा गणेशविद्या। गणक ऋषिः निवृद्गायत्री छन्दः । गणपतिर्देवता। ॐ गं गणपतये नमः ॥ ७॥

तीनों देहोंसे परे हो। तुम नित्य मूलाधारचक्रमें स्थित हो। तुम प्रभु-शक्ति, उत्साह-शक्ति और मन्त्र-शक्ति-इन तीनों शक्तियोंसे संयुक्त हो। योगिजन नित्य तुम्हारा ध्यान करते हैं। तुम ब्रह्मा हो, तुम विष्णु हो, तुम रुद्र हो, तुम इन्द्र हो, तुम अग्नि हो, तुम वायु हो, तुम सूर्य हो, तुम चन्द्रमा हो, तुम (सगुण) ब्रह्म हो, तुम (निर्गुण) त्रिपाद भूः भुवः स्वः एवं प्रणव हो ॥ ६ ॥

'गण' शब्दके आदि अक्षर गकारका पहले उच्चारण करके अनन्तर आदिवर्ण अकारका उच्चारण करे। उसके बाद अनुस्वार रहे। इस प्रकार अर्धचन्द्रसे पहले शोभित जो 'गं' है, वह ओंकारके द्वारा रुद्ध हो अर्थात् उसके पहले और पीछे भी ओंकार हो। यही तुम्हारे मन्त्रका स्वरूप (ॐ गं ॐ) है। 'गकार' पूर्वरूप है, 'अकार' मध्यमरूप है, 'अनुस्वार' अन्त्य-रूप है। 'बिन्दु' उत्तररूप है। 'नाद' संधान है। 'संहिता' सन्धि है। ऐसी यह गणेशविद्या है। इस विद्याके गणक ऋषि हैं, निवृद् गायत्री छन्द है और गणपति देवता हैं। मन्त्र है- 'ॐ गं गणपतये नमः ।' ॥७॥

एकदन्ताय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि। तन्नो दन्ती प्रचोदयात् ॥ ८ ॥

एकदन्तं चतुर्हस्तं पाशमङ्‌कुशधारिणम् । रदं च वरदं हस्तैर्बिभ्राणं मूषकध्वजम् ॥ रक्तं लम्बोदरं शूर्पकर्णकं रक्तवाससम् । रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गं रक्तपुष्पैः सुपूजितम् ॥ भक्तानुकम्पिनं देवं जगत्कारणमच्युतम् । आविर्भूतं च सृष्ट्यादौ प्रकृतेः पुरुषात्परम् ॥

एवं ध्यायति यो नित्यं स योगी योगिनां वरः ॥ ९ ॥

नमो व्रातपतये नमो गणपतये नमः प्रमथपतये नमस्तेऽस्तु लम्बोदरायैकदन्ताय विघ्ननाशिने शिवसुताय श्रीवरदमूर्तये नमः ॥ १०॥

एकदन्तको हम जानते हैं, वक्रतुण्डका हम ध्यान करते हैं। दन्ती हमको उस ज्ञान और ध्यानमें प्रेरित करें ॥ ८ ॥

गणपतिदेव एकदन्त और चतुर्बाहु हैं। वे अपने चार हाथोंमें पाश, अंकुश, दन्त और वरमुद्रा धारण करते हैं। उनके ध्वजमें मूषकका चिह्न है। वे रक्तवर्ण, लम्बोदर, शूर्पकर्ण तथा रक्तवस्त्रधारी हैं। रक्तचन्दनके द्वारा उनके अंग अनुलिप्त हैं। वे रक्तवर्णके पुष्पोंद्वारा सुपूजित हैं। भक्तोंकी कामना पूर्ण करनेवाले, ज्योतिर्मय, जगत्‌के कारण, अच्युत तथा प्रकृति और पुरुषसे परे विद्यमान वे पुरुषोत्तम सृष्टिके आदिमें आविर्भूत हुए। इनका जो इस प्रकार नित्य ध्यान करता है, वह योगी योगियोंमें श्रेष्ठ है ॥ ९ ॥

व्रातपतिको नमस्कार, गणपतिको नमस्कार, प्रमथपतिको नमस्कार; लम्बोदर, एकदन्त, विघ्ननाशक, शिवतनय श्रीवरदमूर्तिको नमस्कार है ॥ १०

एतदथर्वशीर्षं योऽधीते। स ब्रह्मभूयाय कल्पते। स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते। स सर्वतः सुखमेधते स पञ्चमहापापात्प्रमुच्यते। सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति । प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायं प्रातः प्रयुञ्जानो अपापो भवति । सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति धर्मार्थकाममोक्षं च विन्दति । इदमथर्वशीर्ष-मशिष्याय न देयम्। यो यदि मोहाद्दास्यति स पापीयान् भवति। सहस्त्रावर्तनाद् यं यं काममधीते तं तमनेन साधयेत् ॥ ११ ॥

अनेन गणपतिमभिषिञ्चति स वाग्मी भवति । चतुर्थ्यामनश्नञ्जपति स विद्यावान् भवति । इत्यथर्वण-

इस अथर्वशीर्षका जो पाठ करता है, वह ब्रह्मीभूत होता है, वह किसी प्रकारके विघ्नोंसे बाधित नहीं होता, वह सर्वतोभावेन सुखी होता है, वह पंच महापापोंसे मुक्त हो जाता है। सायंकाल इसका पाठ करनेवाला दिनमें किये हुए पापोंका नाश करता है, प्रातःकाल पाठ करनेवाला रात्रिमें किये हुए पापोंका नाश करता है। सायं और प्रातःकाल पाठ करनेवाला निष्पाप हो जाता है। (सदा) सर्वत्र पाठ करनेवाला सभी विघ्नोंसे मुक्त हो जाता है एवं धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष-इन चारों पुरुषार्थोंको प्राप्त करता है। यह अथर्वशीर्ष उसको नहीं देना चाहिये, जो शिष्य न हो। जो मोहवश अशिष्यको उपदेश देगा, वह महापापी होगा। इसकी एक हजार आवृत्ति करनेसे उपासक जो कामना करेगा, इसके द्वारा उसे सिद्ध कर लेगा ॥ ११ ॥

जो इस मन्त्रके द्वारा श्रीगणपतिका अभिषेक करता है, वह वाग्मी हो जाता है। जो चतुर्थी तिथिमें उपवासकर जप करता है, वह विद्यावान् (अध्यात्मविद्याविशिष्ट) हो जाता है। यह अथर्वण-वाक्य

वाक्यम् । ब्रह्माद्यावरणं विद्यात् । न बिभेति कदाचनेति ॥ १२ ॥

यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति स वैश्रवणोपमो भवति। यो लाजैर्यजति स यशोवान् भवति । स मेधावान् भवति। यो मोदकसहस्त्रेण यजति स वाञ्छितफलमवाप्नोति । यः साज्यसमिद्भिर्यजति स सर्वं लभते स सर्वं लभते ॥ १३ ॥

अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा सूर्यवर्चस्वी भवति । सूर्यग्रहे महानद्यां प्रतिमासंनिधौ वा जप्त्वा सिद्धमन्त्रो भवति। महाविघ्नात् प्रमुच्यते। महापापात् प्रमुच्यते । महादोषात् प्रमुच्यते। स सर्वविद् भवति । स सर्वविद् भवति । य एवं वेद ॥ १४ ॥ इत्युपनिषत् ॥

है। जो ब्रह्मादि आवरणको जानता है, वह कभी भयभीत नहीं होता ॥ १२ ॥

जो दूर्वांकुरोंद्वारा यजन करता है, वह कुबेरके समान हो जाता है। जो लाजाके द्वारा यजन करता है, वह यशस्वी होता है, वह मेधावान् होता है। जो सहस्र मोदकोंके द्वारा यजन करता है, वह मनोवांछित फल प्राप्त करता है। जो घृताक्त समिधाके द्वारा हवन करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है, वह सब कुछ प्राप्त करता है ॥ १३ ॥

जो आठ ब्राह्मणोंको इस उपनिषद्‌का सम्यक् ग्रहण करा देता है, वह सूर्यके समान तेजः सम्पन्न होता है। सूर्यग्रहणके समय महानदीमें अथवा प्रतिमाके निकट इस उपनिषद्‌का जप करके साधक सिद्धमन्त्र हो जाता है। सम्पूर्ण महाविघ्नोंसे मुक्त हो जाता है। महापापोंसे मुक्त हो जाता है। महादोषोंसे मुक्त हो जाता है। वह सर्वविद् हो जाता है। वह सर्वविद् हो जाता है-जो इस प्रकार जानता है ॥ १४ ॥ इस प्रकार यह ब्रह्मविद्या है।